इस्तीफ़े का मुखौटा और पक्षपात की राजनीति: झारखंड सूचना आयुक्त की नियुक्ति में विधि का उपहास !

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 15(6) की विधायी मंशा बिल्कुल स्पष्ट है संस्थागत स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना, इस शर्त के साथ कि राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त “किसी भी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं होगा।” यह प्रावधान किसी औपचारिक या क्षणिक पात्रता का प्रश्न नहीं है, बल्कि एक गहरी संरचनात्मक सुरक्षा है, जिसका उद्देश्य पूरी चयन प्रक्रिया को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखना है। यदि कोई व्यक्ति चयन प्रक्रिया के दौरान यहाँ तक कि उस समय तक जब उसका नाम चयन समिति द्वारा राज्यपाल को अनुशंसित किया जाता है किसी राजनीतिक दल से सक्रिय रूप से जुड़ा रहता है, तो बाद में दिया गया इस्तीफ़ा केवल एक औपचारिक आवरण है। ऐसे इस्तीफ़े न तो पक्षपात को समाप्त करते हैं और न ही कानून की आत्मा को संतुष्ट करते हैं; वे केवल विधि के साथ एक चतुर खेल का उदाहरण बनते हैं।

झारखंड राज्य सूचना आयोग की नियुक्तियों को लेकर उत्पन्न विवाद अब एक सामान्य प्रशासनिक बहस से कहीं आगे बढ़ चुका है। यह एक ऐसा प्रकरण बन गया है, जो यह दिखाता है कि किस प्रकार वैधानिक सुरक्षा उपायों को तकनीकी औपचारिकताओं के सहारे निष्प्रभावी किया जा सकता है। शिवपूजन पाठक, अमूल्य नीरज खलखो और तनुज खत्री के नाम इस विवाद के केंद्र में हैं ऐसे व्यक्तियों के रूप में जिनके प्रत्यक्ष और सक्रिय राजनीतिक संबंध चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

शिवपूजन पाठक का भारतीय जनता पार्टी से जुड़ाव सक्रिय राजनीतिक भागीदारी को दर्शाता है। अमूल्य नीरज खलखो का संबंध भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से रहा है, जहाँ उनकी भूमिका केवल नाममात्र की नहीं, बल्कि कार्यात्मक रही है। तनुज खत्री झारखंड मुक्ति मोर्चा से जुड़े रहे हैं, विशेष रूप से संगठनात्मक या युवा स्तर की इकाइयों के माध्यम से। ये संबंध कोई दूर की कड़ी नहीं, बल्कि स्पष्ट और प्रभावशाली राजनीतिक सहभागिता के प्रमाण हैं, जो चयन प्रक्रिया के दौरान मौजूद थे।

इसके बावजूद, एक सुविधाजनक तर्क प्रस्तुत किया जाता है कि चयन के बाद या नियुक्ति से ठीक पहले दिया गया इस्तीफ़ा इस अयोग्यता को समाप्त कर देता है। यह तर्क न केवल विधिक रूप से कमजोर है, बल्कि नैतिक रूप से भी खोखला है। “किसी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं होना” केवल नियुक्ति के क्षण का प्रश्न नहीं है; यह पूरी चयन प्रक्रिया की शुचिता से जुड़ा हुआ दायित्व है। यदि चयन प्रक्रिया स्वयं राजनीतिक प्रभाव से ग्रस्त हो, तो अंतिम क्षण का इस्तीफ़ा उस प्रक्रिया को निष्पक्ष नहीं बना सकता।

वास्तविक समस्या यह है कि इस्तीफ़े को एक प्रकार के ‘कानूनी शुद्धिकरण’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। मानो एक पत्र लिखते ही पूर्व का पूरा राजनीतिक इतिहास शून्य हो जाता है, और व्यक्ति अचानक पूर्णतः निष्पक्ष हो जाता है। परंतु कानून की दृष्टि में पक्षपात एक ऐसा तत्व है, जो एक बार प्रक्रिया में प्रवेश कर जाए, तो वह केवल औपचारिक कदमों से समाप्त नहीं होता। यह चयन के उस चरण में ही स्थापित हो जाता है, जहाँ राजनीतिक निकटता निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय ने Anjali Bhardwaj v. Union of India में स्पष्ट किया कि सूचना आयोगों की वैधता उनकी चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता और तटस्थता पर निर्भर करती है। इसी प्रकार Union of India v. Namit Sharma में यह माना गया कि सूचना आयोग अर्ध-न्यायिक निकाय हैं, जिनकी स्वतंत्रता न्यायिक संस्थाओं के समान होनी चाहिए। यहाँ मानक केवल वास्तविक पक्षपात का अभाव नहीं, बल्कि पक्षपात की युक्तिसंगत आशंका का भी अभाव है। चयन प्रक्रिया के दौरान राजनीतिक संबद्धता इस मानक का सीधा उल्लंघन करती है।

झारखंड का यह प्रकरण केवल एक राज्य का विवाद नहीं, बल्कि एक व्यापक चेतावनी है। जब प्रत्यक्ष राजनीतिक संबंध रखने वाले व्यक्तियों को चयन प्रक्रिया में शामिल होने दिया जाता है और फिर अंतिम क्षण में इस्तीफ़े के माध्यम से उन्हें “तटस्थ” घोषित कर दिया जाता है, तो यह कानून का पालन नहीं, बल्कि उसका व्यवस्थित परिहार है। इससे न केवल वैधानिक प्रावधानों का महत्व कम होता है, बल्कि संस्थाओं की विश्वसनीयता भी गंभीर रूप से प्रभावित होती है।

यदि ऐसी प्रवृत्तियाँ सामान्य हो जाती हैं, तो सूचना आयोग स्वतंत्र निगरानी संस्थान न रहकर राजनीतिक संरक्षण के साधन बन जाएंगे। वहाँ निष्पक्षता नहीं, बल्कि सुविधा और निष्ठा का शासन होगा। आरटीआई अधिनियम, जो पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए बनाया गया था, उसी के भीतर अपारदर्शिता और पक्षपात को वैधता मिलने लगेगी।

और अंततः, यदि यही चलन बना रहा, तो शायद भविष्य में नियुक्ति प्रक्रिया और भी “सरल” हो जाएगी पहले खुलकर राजनीति कीजिए, फिर एक इस्तीफ़ा लिखिए, और तत्क्षण “निष्पक्षता” का प्रमाणपत्र प्राप्त कर लीजिए। कानून की किताबें शायद तब केवल एक औपचारिक सजावट बनकर रह जाएँगी, और न्याय का स्थान एक कागज़ी इस्तीफ़े की स्याही ले लेगी।

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