नई दिल्ली: न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने सात राज्यों को न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष करने के लिए अपने सेवा नियमों में बदलाव करने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि 60 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद सेवा जारी रखने का फैसला संबंधित हाई कोर्ट द्वारा अधिकारी की उपयुक्तता और प्रदर्शन के आकलन पर निर्भर करेगा।
इन 7 राज्यों में रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का निर्देश
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं, ने उन राज्यों को लेकर निर्देश जारी किया है जिन्होंने न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाने पर सहमति जताई है।
इन राज्यों में छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, सिक्किम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन राज्यों को अपने संबंधित सेवा नियमों में आवश्यक संशोधन करने और न्यायिक सेवा में सेवानिवृत्ति की उम्र 62 वर्ष करने का निर्देश दिया है।
हालांकि, 60 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद अधिकारी की सेवा जारी रखने से पहले संबंधित हाई कोर्ट उसकी Suitability और Performance का आकलन करेगा।
60 साल की उम्र पूरी कर चुके अधिकारियों के लिए भी अहम निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक संबंधित राज्यों में सेवा नियमों में औपचारिक बदलाव नहीं हो जाता, तब तक इन राज्यों में 60 वर्ष की आयु पूरी कर चुके न्यायिक अधिकारियों को 62 वर्ष की उम्र तक केवल इस आधार पर सेवानिवृत्त नहीं किया जाएगा।
यह व्यवस्था भी संबंधित हाई कोर्ट द्वारा अधिकारी की उपयुक्तता और प्रदर्शन के मूल्यांकन के अधीन होगी। यानी रिटायरमेंट की उम्र बढ़ने का लाभ स्वतः सभी अधिकारियों को नहीं मिलेगा, बल्कि सेवा जारी रखने के लिए निर्धारित मूल्यांकन प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
31 मार्च या उसके बाद रिटायर हुए अधिकारियों को भी मौका
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का एक महत्वपूर्ण पहलू उन न्यायिक अधिकारियों से जुड़ा है जो इस साल 31 मार्च या उसके बाद सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
अदालत ने कहा कि ऐसे अधिकारियों को दोबारा न्यायिक सेवा में शामिल होने का विकल्प दिया जाएगा, बशर्ते उन्होंने इस बीच कोई दूसरी नौकरी स्वीकार न की हो। इससे हाल में रिटायर हुए न्यायिक अधिकारियों के लिए सेवा में वापस आने का रास्ता खुल सकता है।
कई राज्यों को फैसले पर दोबारा विचार करने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने केवल इन सात राज्यों तक ही मामला सीमित नहीं रखा है। अदालत ने कई अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाने के मुद्दे पर अपने फैसले पर फिर से विचार करने को कहा है।
इनमें आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, केरल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी शामिल हैं।
अन्य राज्यों को दो हफ्ते का समय
सुप्रीम कोर्ट ने इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस मुद्दे पर दो सप्ताह के भीतर अपना फैसला लेने को कहा है। इसके बाद उन्हें अदालत में Compliance Report भी दाखिल करनी होगी।
शीर्ष अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु में अंतर एक ऐसा मुद्दा है जिस पर उचित तरीके से विचार किया जाना जरूरी है। अदालत के ताजा निर्देश के बाद अब उन राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है जहां अभी न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष है।
हाई कोर्ट के आकलन पर निर्भर होगी सेवा
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का सबसे अहम हिस्सा यह है कि 62 वर्ष तक सेवा जारी रखने का अधिकार बिना शर्त नहीं होगा। संबंधित हाई कोर्ट को अधिकारी की Suitability, Performance और सेवा रिकॉर्ड का आकलन करना होगा।
इसका मतलब है कि रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाए जाने के बावजूद न्यायिक अधिकारी को 60 वर्ष के बाद सेवा में बने रहने के लिए निर्धारित मानकों पर खरा उतरना होगा।
न्यायिक सेवा में उम्र सीमा को लेकर नई बहस
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तों और सेवानिवृत्ति आयु को लेकर देशभर में नई चर्चा शुरू हो सकती है। सात राज्यों में 62 वर्ष की सीमा लागू करने की दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ अन्य राज्यों पर भी अपने नियमों की समीक्षा करने का दबाव बढ़ सकता है।
अब देखना होगा कि जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दो सप्ताह का समय दिया गया है, वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र को लेकर क्या रुख अपनाते हैं।
