BJP का परिसीमन चक्रव्यूह! क्या कांग्रेस को अलग-थलग करने की तैयारी? महिला आरक्षण पर विपक्षी एकता की अग्निपरीक्षा

परिसीमन और महिला आरक्षण को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) की रणनीति ने विपक्षी दलों के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। कांग्रेस को आशंका है कि सरकार लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए विपक्षी खेमे में समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा की यह रणनीति कांग्रेस को अलग-थलग कर सकती है और SIR के विरोध में बनी विपक्षी एकजुटता को कमजोर कर सकती है?

परिसीमन विधेयक पर फिर तेज हुई सियासी हलचल

परिसीमन के मुद्दे पर भाजपा की रणनीति को लेकर विपक्षी दलों के बीच चर्चा तेज हो गई है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने संसद का संक्षिप्त सत्र बुलाए जाने की संभावना को लेकर अटकलों को हवा दी है। इससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों पर आगे बढ़ने के लिए नए सिरे से राजनीतिक सहमति बनाने की कोशिश कर रही है।

कांग्रेस को आशंका है कि भाजपा विपक्षी गठबंधन के दूसरे दलों से समर्थन हासिल करके दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर सकती है। अगर ऐसा होता है, तो विपक्ष के भीतर राजनीतिक मतभेद बढ़ सकते हैं। हालांकि, सरकार की वास्तविक रणनीति और विधेयक को दोबारा संसद में लाने की समयसीमा को लेकर अंतिम स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।

लोकसभा में क्यों अटक गया था संविधान संशोधन विधेयक?

इस राजनीतिक विवाद की एक अहम कड़ी अप्रैल 2026 में लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पर हुई वोटिंग है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, सरकार महिला आरक्षण को लागू करने और लोकसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने से संबंधित प्रस्ताव को पारित कराने में सफल नहीं हो सकी थी।

वोटिंग के दौरान विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े थे। कुल 528 सदस्यों के मतदान में दो-तिहाई बहुमत के लिए कम से कम 352 वोटों की आवश्यकता थी। इस तरह प्रस्ताव को जरूरी समर्थन नहीं मिल पाया।

विधेयक का उद्देश्य 2029 से विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने और लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने से जुड़ा बताया गया है। अब इसी मुद्दे पर नए सिरे से सहमति बनाने की संभावनाओं ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है।

कांग्रेस को डर, विपक्षी दलों के समर्थन से बदल सकता है समीकरण

कांग्रेस को आशंका है कि सरकार विधेयक को पारित कराने के लिए विपक्षी दलों के बीच समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। पार्टी की चिंता केवल संविधान संशोधन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक असर को लेकर भी है।

अगर विपक्षी गठबंधन में शामिल या उसके साथ मुद्दों पर खड़े क्षेत्रीय दल परिसीमन के सवाल पर सरकार के प्रस्ताव का समर्थन करते हैं, तो कांग्रेस की रणनीति प्रभावित हो सकती है। इससे विपक्षी एकता के स्वरूप पर भी सवाल उठ सकते हैं।

हालांकि, किसी क्षेत्रीय दल की सरकार से बातचीत को अपने आप में कांग्रेस से दूरी या विपक्षी गठबंधन टूटने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। परिसीमन जैसे संवैधानिक मुद्दे पर अलग-अलग दलों की अपनी क्षेत्रीय और राजनीतिक चिंताएं भी हैं।

मल्लिकार्जुन खरगे ने पीएम मोदी को लिखा चौथा पत्र

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर परिसीमन और महिला आरक्षण से संबंधित प्रस्तावों पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग दोहराई। यह इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को लिखा गया उनका चौथा पत्र बताया गया है।

खरगे ने अपने पत्र में कहा कि राष्ट्रीय परिसीमन जैसे संवेदनशील संवैधानिक सुधारों पर एकतरफा फैसला लेना उचित नहीं होगा। परिसीमन का सीधा असर संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और राज्यों के प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। इसलिए इस विषय पर सभी राजनीतिक दलों के साथ व्यापक चर्चा जरूरी है।

कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी याद दिलाया कि उन्होंने पहली बार 11 अप्रैल 2026 को सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी। उनके मुताबिक, इसके बावजूद 14 अप्रैल की देर शाम विधेयक सार्वजनिक किए गए और 16 अप्रैल को विशेष संसद सत्र बुलाया गया।

खरगे ने कहा कि 17 अप्रैल को संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर पाया था। इसके बाद उन्होंने 16 जुलाई और 27 अगस्त को भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखे। अब चौथी बार उन्होंने सरकार से एकतरफा कदम उठाने से बचने और सभी दलों से परामर्श करने की अपील की है।

खरगे के पत्र पर किरेन रिजिजू का जवाब

कांग्रेस अध्यक्ष की मांग पर केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कांग्रेस की ओर से चर्चा के लिए तारीखें तय नहीं किए जाने के बाद सरकार ने व्यापक सहमति बनाने के लिए अन्य राजनीतिक दलों से संपर्क किया।

रिजिजू के अनुसार, इस प्रस्तावित कानून पर समाजवादी पार्टी (SP), द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK), वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-शरदचंद्र पवार (NCP-SP), शिवसेना (UBT), ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) और बीजू जनता दल (BJD) समेत कई दलों के प्रतिनिधियों के साथ परामर्श किया गया है।

इस प्रतिक्रिया से साफ है कि सरकार व्यापक राजनीतिक समर्थन जुटाने की कोशिश का दावा कर रही है, जबकि कांग्रेस सभी दलों की मौजूदगी में औपचारिक चर्चा पर जोर दे रही है। दोनों पक्षों के बीच विवाद अब केवल विधेयक के प्रावधानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात पर भी है कि संवैधानिक बदलावों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया कैसी होनी चाहिए।

संसद का सत्रावसान नहीं होने पर भी उठे सवाल

खरगे ने संसद के मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं किए जाने को लेकर भी चिंता जताई थी। इसके जवाब में रिजिजू ने कहा कि संविधान में ऐसा कोई निश्चित नियम नहीं है, जिसके तहत अनिश्चितकाल के लिए स्थगित सदन का किसी निर्धारित समयसीमा के भीतर सत्रावसान करना अनिवार्य हो।

संसदीय प्रक्रिया में अनिश्चितकाल के लिए स्थगन और सत्रावसान अलग-अलग स्थितियां हैं। जब सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया जाता है, तो सत्र की अगली बैठक की तारीख तय नहीं होती। इसके विपरीत, सत्रावसान सत्र को औपचारिक रूप से समाप्त करने की प्रक्रिया है, जिसके लिए राष्ट्रपति का आदेश आवश्यक होता है।

रिजिजू ने कहा कि केवल सत्रावसान नहीं होने से अपने आप कोई संवैधानिक या प्रक्रियात्मक अनियमितता नहीं बनती। इस व्यवस्था के कारण संसद का सत्र दोबारा बुलाने की संभावना बनी रह सकती है। परिसीमन विधेयक संविधान संशोधन से जुड़ा होने के कारण इसे अध्यादेश के जरिए लागू नहीं किया जा सकता।

SIR के मुद्दे पर विपक्ष साथ, लेकिन परिसीमन पर अलग-अलग रुख की आशंका

पिछले कुछ हफ्तों में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के विरोध में कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों और कई क्षेत्रीय पार्टियों के बीच एकजुटता देखने को मिली है। हालांकि, परिसीमन के मुद्दे पर यही एकजुटता कितनी कायम रहेगी, इसे लेकर सवाल उठने लगे हैं।

कुछ क्षेत्रीय दल SIR के मुद्दे पर कांग्रेस के साथ खड़े दिखाई दिए हैं, भले ही वे विपक्षी गठबंधन के सभी कार्यक्रमों में शामिल नहीं हुए हों। इससे यह स्पष्ट होता है कि अलग-अलग राजनीतिक मुद्दों पर दलों के बीच सहयोग का स्वरूप बदल सकता है।

DMK के रुख को लेकर भी राजनीतिक चर्चा होती रही है। एक ओर पार्टी नीट के खिलाफ आंदोलन का समर्थन करती है, वहीं तमिलनाडु में विजय और उनकी पार्टी TVK को समर्थन देने के सवाल पर कांग्रेस के रुख को लेकर मतभेद सामने आने की बात कही गई है।

इसके अलावा शिवसेना (UBT) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) जैसे दलों के राजनीतिक रुख भी अलग-अलग मुद्दों पर विपक्षी रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में परिसीमन पर सरकार के साथ बातचीत विपक्षी दलों के सामने नई चुनौती पेश कर सकती है।

भाजपा की क्षेत्रीय दलों को साधने की रणनीति क्या है?

परिसीमन पर आम सहमति बनाने की कोशिश में भाजपा क्षेत्रीय दलों की चिंताओं को दूर करने पर जोर दे रही है। खबर में दिए गए प्रस्तावित फॉर्मूले के अनुसार, लोकसभा की सीटों में बढ़ोतरी सभी राज्यों में मौजूदा सीटों के अनुपात में 50 प्रतिशत की वृद्धि के आधार पर करने की बात कही गई है।

इसका उद्देश्य राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर पैदा होने वाली आशंकाओं को कम करना बताया जा रहा है। हालांकि, परिसीमन के किसी भी प्रस्ताव का वास्तविक प्रभाव उसके अंतिम प्रावधानों, सीटों के वितरण और संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

दक्षिणी और अन्य राज्यों के राजनीतिक दलों के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण है कि सीटों की संख्या बढ़ने के बाद संसद में उनका प्रतिनिधित्व किस तरह प्रभावित होगा। यही वजह है कि परिसीमन का मुद्दा केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि संघीय ढांचे और राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व के संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।

महिला आरक्षण विधेयक विपक्ष के लिए क्यों बन सकता है चुनौती?

महिला आरक्षण का मुद्दा भी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण है। प्रस्तावित व्यवस्था में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई है। ऐसे में किसी भी पार्टी के लिए महिला आरक्षण का विरोध करना राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकता है।

भाजपा को इससे विपक्षी दलों पर सवाल उठाने का अवसर मिल सकता है, जबकि विधेयक का समर्थन करने वाले क्षेत्रीय दल महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के पक्ष में अपना रुख प्रस्तुत कर सकते हैं।

दूसरी ओर, आरक्षण लागू करने की समयसीमा, परिसीमन से उसका संबंध और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने के प्रभाव जैसे सवाल भी राजनीतिक बहस का हिस्सा हैं। विपक्षी दलों के लिए चुनौती यह होगी कि वे महिला आरक्षण के समर्थन और परिसीमन के प्रावधानों पर अपनी चिंताओं के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं।

क्या परिसीमन से विपक्षी एकता में लगेगी सेंध?

परिसीमन विधेयक पर सरकार और क्षेत्रीय दलों के बीच बातचीत ने कांग्रेस के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। SIR जैसे मुद्दों पर बनी एकजुटता के बावजूद संवैधानिक संशोधन, महिला आरक्षण और राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर अलग-अलग दलों की प्राथमिकताएं सामने आ सकती हैं।

भाजपा की रणनीति सफल होती है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार विधेयक के लिए आवश्यक समर्थन जुटा पाती है या नहीं और विपक्षी दल अंतिम प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाते हैं।

फिलहाल कांग्रेस सर्वदलीय बैठक और व्यापक विचार-विमर्श की मांग कर रही है, जबकि सरकार अन्य दलों से बातचीत के जरिए सहमति बनाने की बात कह रही है। ऐसे में परिसीमन का मुद्दा आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति और विपक्षी एकता की दिशा तय करने वाले प्रमुख विषयों में शामिल रह सकता है।

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