संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज को बड़ी राहत देते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत उसकी निवारक हिरासत को रद्द कर दिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को अकेले NSA के तहत किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने हिरासत आदेश को अवैध तरीके से इस्तेमाल किया गया मानते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख की लागत भी लगाई है।
पुलिस हिरासत के कथित कबूलनामे पर कोर्ट ने उठाया सवाल
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पुलिस हिरासत के दौरान आरोपी की ओर से दिए गए कथित कबूलनामे को NSA जैसी निवारक हिरासत का आधार बनाया जा सकता है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इसी पहलू पर राज्य सरकार से सवाल किए थे। अब अपने फैसले में पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल ऐसे कथित कबूलनामे के आधार पर निवारक हिरासत का आदेश कायम नहीं रखा जा सकता।
कोर्ट ने पाया कि हिरासत का आदेश पारित करते समय प्रासंगिक और उपयुक्त सामग्री पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने NSA के तहत जारी हिरासत आदेश के साथ-साथ उससे जुड़े पुष्टि आदेश और इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी रद्द कर दिया, जिसमें हिरासत को बरकरार रखा गया था।
24 नवंबर 2024 को संभल में भड़की थी हिंसा
पूरा मामला 24 नवंबर 2024 को संभल की शाही जामा मस्जिद के कोर्ट-निर्देशित सर्वे के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है। सर्वे के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प हुई थी। इस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे। मुल्ला अफरोज को इस मामले में आरोपी बनाया गया था।
अफरोज को घटना के करीब 54 दिन बाद जनवरी 2025 में गिरफ्तार किया गया था। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट से उसे जमानत मिली। हालांकि, उसकी रिहाई के बाद अक्टूबर 2025 में उसके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निवारक हिरासत का आदेश जारी किया गया।
अक्टूबर 2025 में NSA के तहत लिया गया था हिरासत में
रिपोर्टों के अनुसार, संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने 13 अक्टूबर 2025 को NSA की धारा 3(2) के तहत अफरोज की निवारक हिरासत का आदेश जारी किया था। राज्य सरकार ने इस कार्रवाई का बचाव करते हुए तर्क दिया था कि उसकी रिहाई से दोबारा हिंसा भड़कने या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी।
अफरोज ने इस हिरासत को चुनौती देते हुए पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट ने हिरासत को बरकरार रखा, जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। अब शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले और हिरासत से जुड़े आदेशों को निरस्त कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने UP सरकार पर क्यों लगाया ₹10 लाख का खर्च?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निवारक हिरासत की शक्ति का इस्तेमाल कानून के मुताबिक उचित सामग्री और संतोष के आधार पर किया जाना चाहिए। अदालत के अनुसार, इस मामले में संबंधित अधिकारियों ने उपयुक्त सामग्री पर पर्याप्त विचार नहीं किया और हिरासत की शक्ति का इस्तेमाल गलत तरीके से हुआ। इसी के चलते उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख की लागत लगाई गई।
यह रकम अफरोज को देय लागत के रूप में राज्य सरकार पर लगाई गई है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक राज्य को यह ₹10 लाख एक महीने के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया गया है।
NSA क्या है और इस मामले में विवाद किस बात पर था?
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी National Security Act, 1980 के तहत सरकार कुछ परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को निवारक हिरासत में रख सकती है, ताकि उसे ऐसे कार्य करने से रोका जा सके जो निर्धारित कानूनी आधारों के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए प्रतिकूल हो सकते हैं। यह सामान्य आपराधिक मुकदमे में सजा देने की प्रक्रिया से अलग निवारक हिरासत की व्यवस्था है।
इस मामले में विवाद NSA लगाने के अधिकार से ज्यादा उस सामग्री को लेकर था, जिसके आधार पर अफरोज को हिरासत में रखने का आदेश दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से कथित पुलिस-कस्टडी कबूलनामे को अकेले पर्याप्त आधार मानने से इनकार किया।
अब क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अफरोज की NSA के तहत हिरासत का आदेश समाप्त हो गया है। हालांकि, अदालत के आदेश का अर्थ यह नहीं है कि संभल हिंसा से जुड़े सभी आपराधिक आरोप स्वतः समाप्त हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा फैसला विशेष रूप से निवारक हिरासत को चुनौती देने वाली कार्यवाही से संबंधित है। यदि किसी अन्य मामले में उसकी हिरासत कानूनी रूप से आवश्यक हो, तो अदालत के आदेश में उसका अलग प्रभाव हो सकता है।
संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला निवारक हिरासत के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री और पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे की कानूनी भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी के तौर पर सामने आया है। मामले में विस्तृत फैसले के आधार पर आगे की कानूनी स्थिति और स्पष्ट होगी।
