CJI Surya Kant News: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने किशोर न्याय व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि कानून के दायरे में आने वाले 18 साल से कम उम्र के बच्चों की केवल बात सुनना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी परिस्थितियों और चिंताओं को समझना भी जरूरी है। जस्टिस सूर्यकांत ने इस बात पर जोर दिया कि बहुत कम बच्चे पुलिस या किसी अधिकारी के सामने खुलकर अपनी बात रख पाते हैं। ऐसे में उनके साथ व्यवहार करते समय उनकी परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए। किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के दस साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि बच्चों के मामलों में दंड देने के बजाय सुधार और पुनर्वास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वहीं, सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने भी बच्चों की भावनाओं और चिंताओं को समझने की जरूरत बताई। यह बयान ऐसे समय में सामने आया है, जब CJP के प्रदर्शन को लेकर भी चर्चा हो रही है।
CJI सूर्यकांत ने 18 साल से कम उम्र के बच्चों को लेकर क्या कहा?
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कानून के दायरे में आने वाले बच्चों के साथ संवेदनशीलता से पेश आने की जरूरत है। उनके मुताबिक, कई बार जिस बच्चे को कानून का उल्लंघन करने के मामले में पकड़ा जाता है, वह कुछ समय पहले तक ऐसा बच्चा हो सकता है जिसे देखभाल और सुरक्षा की आवश्यकता थी, लेकिन समय पर उस तक मदद नहीं पहुंच पाई।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों के मामलों को केवल उनके किए गए कृत्य के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनकी परिस्थितियों, पारिवारिक माहौल और उन कारणों को समझना भी आवश्यक है, जिनकी वजह से वे कानून के दायरे में आए।
जस्टिस सूर्यकांत के अनुसार, बहुत कम बच्चे पुलिस या अधिकारियों के सामने अपनी बात प्रभावी ढंग से रख पाते हैं। इसलिए संबंधित अधिकारियों और व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों की बात ध्यानपूर्वक सुनें और उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास करें।
बच्चों को सजा देने के बजाय सुधार पर होना चाहिए जोर
जस्टिस सूर्यकांत ने किशोर न्याय व्यवस्था के मूल उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि बच्चों के मामलों में सुधार को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, न कि केवल सजा को। किशोर न्याय अधिनियम, 2015 का उद्देश्य भी बच्चों की देखभाल, सुरक्षा, पुनर्वास और समाज में उनकी दोबारा भागीदारी को बढ़ावा देना है।
इस कानून के तहत बच्चों के मामलों में उनकी उम्र, परिस्थितियों और मामले की प्रकृति को ध्यान में रखकर कदम उठाने पर जोर दिया गया है। जहां उपयुक्त हो, वहां औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया से अलग विकल्प अपनाने और बच्चों को सुधार का अवसर देने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण मानी गई है।
काउंसलिंग, सामुदायिक सेवा, परिवीक्षा और पुनर्वास जैसे उपायों के जरिए बच्चों को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बचपन में हुई किसी गलती के कारण बच्चे का भविष्य पूरी तरह प्रभावित न हो और उसे समाज की मुख्यधारा में लौटने का अवसर मिले।
किशोर न्याय अधिनियम 2015 में बच्चों के लिए क्या है प्रावधान?
किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 बच्चों की देखभाल, संरक्षण, विकास और पुनर्वास से संबंधित महत्वपूर्ण कानून है। यह कानून उन बच्चों से जुड़े मामलों को भी संबोधित करता है, जिन पर कानून का उल्लंघन करने का आरोप हो या जिन्हें देखभाल और सुरक्षा की जरूरत हो।
इस कानून की व्यवस्था में बच्चों के सर्वोत्तम हित, उनकी गरिमा, पुनर्वास और सामाजिक पुनर्समावेशन को महत्व दिया गया है। संस्थागत देखभाल को अंतिम विकल्प के रूप में देखने और उपयुक्त मामलों में वैकल्पिक उपायों को बढ़ावा देने की अवधारणा भी इसी दृष्टिकोण का हिस्सा है।
जस्टिस सूर्यकांत ने अपने संबोधन में इसी सोच की ओर ध्यान दिलाया कि बच्चों को केवल अपराधी के रूप में देखने के बजाय उनके सुधार और भविष्य को ध्यान में रखकर कदम उठाने चाहिए। किसी बच्चे को दूसरा अवसर देना उसे जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा में आगे बढ़ने में मदद कर सकता है।
संविधान के अनुच्छेद 15(3) और 39 में भी बच्चों के हितों पर जोर
बच्चों के संरक्षण और उनके कल्याण की अवधारणा भारतीय संविधान में भी दिखाई देती है। संविधान का अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है। वहीं, अनुच्छेद 39 बच्चों के स्वस्थ विकास, समान अवसरों और शोषण से सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण उद्देश्यों से जुड़ा है।
इसके अतिरिक्त, संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (United Nations Convention on the Rights of the Child) भी बच्चों के अधिकारों, संरक्षण, विकास और समाज में उनकी भागीदारी पर जोर देता है।
किशोर न्याय व्यवस्था में इन सिद्धांतों का महत्व इसलिए है, क्योंकि बच्चों के साथ न्याय करते समय उनकी उम्र और विकास की अवस्था को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। सुधार और पुनर्वास पर आधारित दृष्टिकोण बच्चों को भविष्य में समाज के जिम्मेदार सदस्य के रूप में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान कर सकता है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना बोलीं- बच्चों की चिंताओं को नजरअंदाज न करें
सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने भी कार्यक्रम में बच्चों की भावनाओं और चिंताओं को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया। वह सुप्रीम कोर्ट की किशोर न्याय समिति की प्रमुख हैं।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि वयस्कों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों की समस्याओं को समझें और उनकी चिंताओं को नजरअंदाज न करें। यदि बच्चों की बातों को लगातार अनदेखा किया जाता है, तो वे खुद को अलग-थलग और अस्वीकार किया हुआ महसूस कर सकते हैं।
उन्होंने बच्चों के प्रति समाज की जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी समाज और उसके बड़ों की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वे अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों की परेशानियों को अपनी जिम्मेदारी समझना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी जरूरतों को नजरअंदाज न किया जाए।
बच्चों को अलग-थलग पड़ने से बचाना समाज की जिम्मेदारी
जस्टिस नागरत्ना के संदेश का प्रमुख पहलू यह रहा कि बच्चों की समस्याओं को समय रहते समझना और उनका समाधान करना बेहद जरूरी है। जब बच्चों को लगता है कि उनकी बात कोई नहीं सुन रहा, तो उनमें अकेलेपन और अस्वीकार किए जाने की भावना पैदा हो सकती है।
ऐसी परिस्थितियों में परिवार, स्कूल, सामाजिक संस्थाओं और संबंधित अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों को अपनी बात रखने का अवसर देना, उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनना और जरूरत के अनुसार सहायता उपलब्ध कराना उनके बेहतर भविष्य के लिए आवश्यक है।
उनके संदेश के अनुसार, बच्चों की परेशानियां केवल उनकी व्यक्तिगत समस्या नहीं हैं। उनके संरक्षण, विकास और सुरक्षा की जिम्मेदारी परिवार के साथ-साथ समाज और संबंधित संस्थाओं की भी है।
किशोर न्याय व्यवस्था में संवेदनशीलता क्यों जरूरी?
कानून के दायरे में आने वाले बच्चों के मामलों में संवेदनशीलता इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कम उम्र में लिए गए गलत फैसले या प्रतिकूल परिस्थितियां उनके पूरे जीवन को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक सहयोग, शिक्षा, काउंसलिंग और पुनर्वास पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
सुधार आधारित व्यवस्था बच्चों को अपनी गलतियों से सीखने और जीवन में आगे बढ़ने का अवसर देती है। इसके साथ ही, बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना और समाज में उनके प्रति जिम्मेदार रवैया विकसित करना भी जरूरी है।
CJI जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना के संदेश का व्यापक उद्देश्य यही है कि बच्चों को केवल उनके खिलाफ लगे आरोपों से पहचानने के बजाय उनकी परिस्थितियों, अधिकारों और भविष्य को भी ध्यान में रखा जाए।
CJI सूर्यकांत के बयान का मुख्य संदेश
जस्टिस सूर्यकांत ने किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के दस साल पूरे होने के अवसर पर बच्चों की बात सुनने, उनकी परिस्थितियों को समझने और सुधार को प्राथमिकता देने पर जोर दिया। जस्टिस नागरत्ना ने भी बच्चों की चिंताओं को गंभीरता से लेने और उन्हें अलग-थलग महसूस होने से बचाने की आवश्यकता बताई।
दोनों न्यायाधीशों के संदेश में बच्चों के संरक्षण, पुनर्वास और बेहतर भविष्य की अहमियत सामने आई। किशोर न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल कानूनी प्रक्रिया पूरी करना नहीं, बल्कि बच्चों को जिम्मेदार और समाज से जुड़े नागरिक के रूप में आगे बढ़ने का अवसर देना भी है।
