झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पारा शिक्षकों को पेंशन का मिलेगा लाभ, संविदा सेवा भी जोड़ी जाएगी; सरकार को 8 सप्ताह में भुगतान का आदेश

झारखंड : झारखंड हाईकोर्ट ने पारा शिक्षकों के पेंशन अधिकार से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि नियमित नियुक्ति से पहले संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) के आधार पर दी गई सेवा को भी पेंशन योग्य सेवा में शामिल किया जाएगा। हाईकोर्ट ने पांच सेवानिवृत्त शिक्षकों की याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि उनकी पारा शिक्षक अवधि को नियमित सेवा के साथ जोड़कर पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों की पुनर्गणना की जाए। अदालत ने यह पूरी प्रक्रिया आठ सप्ताह के भीतर पूरी करने और भुगतान में देरी की अवधि के लिए 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज देने का भी आदेश दिया है।

पारा शिक्षक से नियमित शिक्षक बने, लेकिन पेंशन से रह गए वंचित

यह मामला पांच सेवानिवृत्त इंटरमीडिएट प्रशिक्षित शिक्षकों से जुड़ा है, जिन्होंने पहले कई वर्षों तक पारा शिक्षक के रूप में कार्य किया और बाद में चयन प्रक्रिया के माध्यम से नियमित शिक्षक बने। नियमित सेवा में उन्होंने लगभग नौ वर्ष या उससे अधिक समय तक कार्य किया और वर्ष 2025 में सेवानिवृत्त हुए।

हालांकि, नियमित सरकारी सेवा की अवधि 10 वर्ष से कुछ कम रहने के कारण उन्हें पेंशन का लाभ नहीं दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी कि पारा शिक्षक के रूप में 8 से 12 वर्षों तक दी गई उनकी निरंतर सेवा को भी पेंशन योग्य सेवा में शामिल किया जाना चाहिए।

राज्य सरकार ने संविदा सेवा को पेंशन में जोड़ने का किया विरोध

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि पारा शिक्षक के रूप में की गई सेवा पूरी तरह संविदा आधारित थी, इसलिए उसे पेंशन योग्य सेवा नहीं माना जा सकता। सरकार का तर्क था कि याचिकाकर्ताओं ने नियमित सरकारी सेवा में न्यूनतम 10 वर्ष पूरे नहीं किए हैं, इसलिए वे पेंशन के पात्र नहीं हैं।

सरकार ने अपने पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के कुछ पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संविदा सेवा को नियमित सेवा के बराबर नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा- सरकार दोहरा रवैया नहीं अपना सकती

जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने राज्य सरकार की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि जब सरकार नियमित शिक्षक भर्ती में पारा शिक्षकों के लिए 50 प्रतिशत पद आरक्षित रखती है और नियुक्ति के लिए उनकी संविदा सेवा को योग्यता मानती है, तो पेंशन के समय उसी सेवा को नजरअंदाज करना उचित नहीं है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सरकार एक आदर्श नियोक्ता होने के नाते समान परिस्थितियों में दोहरा मापदंड नहीं अपना सकती। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि पेंशन किसी कर्मचारी पर सरकार की कृपा नहीं, बल्कि उसका वैधानिक और अर्जित अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का भी लिया गया आधार

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि पूर्व में भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में यह सिद्धांत स्थापित किया है कि यदि किसी कर्मचारी की संविदा सेवा के बाद नियमित नियुक्ति होती है, तो पूर्व की सेवा को पेंशन के लिए जोड़ा जा सकता है।

इसके अलावा झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के पूर्व निर्णयों का भी हवाला देते हुए अदालत ने माना कि संविदा अथवा अस्थायी सेवा को पेंशन गणना में शामिल करना कानून और न्याय के अनुरूप है।

आठ सप्ताह में पेंशन, ग्रेच्युटी और ब्याज सहित भुगतान का निर्देश

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि सभी याचिकाकर्ताओं की पारा शिक्षक अवधि को नियमित सेवा में जोड़कर पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सभी सेवानिवृत्ति लाभों की दोबारा गणना की जाए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि आदेश प्राप्त होने के आठ सप्ताह के भीतर पूरा भुगतान किया जाए तथा सेवानिवृत्ति की तिथि से वास्तविक भुगतान तक 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज भी दिया जाए।

इस आदेश के साथ अदालत ने मामले का निस्तारण कर दिया। माना जा रहा है कि इस फैसले का प्रभाव भविष्य में ऐसे अन्य पारा शिक्षकों के मामलों पर भी पड़ सकता है।

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