नई दिल्ली: दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में रविवार को हुए दर्दनाक बिल्डिंग हादसे ने कई परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया है। पांच मंजिला PG इमारत के अचानक ढहने से अब तक 7 लोगों की मौत हो चुकी है। हादसे में जान गंवाने वालों में युवा छात्र भी शामिल हैं, जिनके परिवारों के लिए यह हादसा जिंदगी भर का दर्द बन गया है।
इन्हीं में 18 वर्षीय अर्पित जय और दिल्ली विश्वविद्यालय के PGDAV कॉलेज में सेकेंड ईयर के छात्र अक्षत सिंह यादव भी शामिल थे। अर्पित के परिवार ने दुख की इस घड़ी में उनकी आंखें दान करने का फैसला लिया। वहीं, अक्षत की मौत की खबर सुनकर उनके माता-पिता और बहन का रो-रोकर बुरा हाल है।
एक रात पहले बेटे से हुई थी वीडियो कॉल, अगली सुबह मिली मौत की खबर
अर्पित जय के पिता भूपेंद्र जय ने बताया कि उनका बेटा रक्षाबंधन की छुट्टियों के बाद अपने शहर से दिल्ली वापस आया था। हादसे से एक दिन पहले ही वह अपने PG पहुंचा था। परिवार को क्या पता था कि बेटे से यह आखिरी मुलाकात और बातचीत साबित होगी।
भूपेंद्र जय ने कहा कि अगर उन्हें PG की खराब हालत के बारे में पहले पता होता तो वह कभी अपने बेटे को वहां रहने नहीं देते। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि काश उनका बेटा पहले ही उन्हें PG की स्थिति के बारे में बता देता और वह उसे वहां से निकाल पाते।
एक पिता के लिए सबसे मुश्किल बात यह रही कि जिस बेटे से कुछ घंटे पहले तक बातचीत हुई थी, अगली बार उसे उन्होंने जीवित नहीं बल्कि शव के रूप में देखा।
गंभीर चोटों के कारण अर्पित की पहचान करना भी मुश्किल था
अर्पित के दोस्त ने हादसे के बाद की भयावह स्थिति के बारे में बताया। उसके मुताबिक, अर्पित के परिवार और दोस्तों ने पूरी रात उसे तलाश किया, लेकिन उसका कोई पता नहीं चल सका।
दोस्त ने बताया कि सोमवार सुबह AIIMS की ओर से उन्हें जानकारी दी गई कि एक शव उनकी बताई गई पहचान से मेल खा रहा है। लेकिन जब परिवार शव की पहचान करने पहुंचा तो चोटों की गंभीरता के कारण अर्पित को पहचानना बेहद मुश्किल था।
करीब सुबह 6:30 बजे अर्पित का परिवार अस्पताल पहुंचा। आखिरकार उनकी मां ने शरीर पर मौजूद जन्मचिह्नों के जरिए अपने बेटे की पहचान की। परिवार के लिए यह पल बेहद भावुक और दर्दनाक था।
बेटे की आंखें दान कर परिवार ने पेश की मिसाल
अर्पित के परिवार ने बेटे को खोने के गम के बीच उनकी आंखें दान करने का फैसला किया। इस फैसले के जरिए परिवार ने किसी और की जिंदगी में रोशनी देने की कोशिश की है।
अर्पित के पिता ने जिस दर्द के साथ बेटे को PG से निकाल पाने की बात कही, वह इस हादसे के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल भी खड़े करता है। आखिर जिन इमारतों में दूसरे शहरों से आए छात्र रह रहे हैं, उनकी सुरक्षा और हालत की नियमित जांच कितनी गंभीरता से होती है?
अक्षत ने कुछ दिन और घर रुकने से किया था इनकार
इस हादसे में जान गंवाने वाले दूसरे छात्र अक्षत सिंह यादव दिल्ली विश्वविद्यालय के PGDAV कॉलेज में सेकेंड ईयर में पढ़ते थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अक्षत की मौत की खबर मिलने के बाद उनका परिवार सोमवार सुबह नई दिल्ली स्थित AIIMS ट्रॉमा सेंटर पहुंचा।
परिवार के मुताबिक, अक्षत हाल ही में रक्षाबंधन के दौरान घर आए थे। उनके पिता चाहते थे कि वह कुछ दिन और घर पर रुक जाएं, लेकिन अक्षत ने बताया कि उनका टिकट पहले ही बुक हो चुका है और उन्हें दिल्ली लौटना होगा।
परिवार को क्या पता था कि दिल्ली लौटने का यह सफर उनके बेटे के जीवन का आखिरी सफर बन जाएगा।
दो दिन पहले मां से वीडियो कॉल पर हुई थी बात
अक्षत की मां ने बताया कि हादसे से कुछ दिन पहले ही उनकी बेटे से वीडियो कॉल पर बातचीत हुई थी। उस बातचीत में परिवार ने अक्षत से जुड़ी कई सामान्य बातें की थीं, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि यह उनकी आखिरी बातचीत में से एक होगी।
अक्षत को तलवारों में काफी रुचि थी। उनकी मां के मुताबिक, हाल ही में करीब 2,500 रुपये की एक तलवार घर पहुंची थी। वीडियो कॉल के दौरान परिवार ने जब अक्षत को वह तलवार दिखाई तो वह काफी खुश हुए थे।
आज वही वीडियो कॉल और उससे जुड़ी छोटी-छोटी यादें परिवार के लिए बेहद भावुक कर देने वाली हैं।
‘एक दिन अफसर बनकर आपको गर्व महसूस कराऊंगा’
अक्षत के पिता ने बताया कि उनके बेटे की पढ़ाई को लेकर शिक्षक अक्सर उसकी तारीफ करते थे। अक्षत अपने पिता से कहा करते थे कि वह एक दिन अफसर बनकर उन्हें गर्व महसूस कराएंगे।
बेटे के इन सपनों को याद करते हुए परिवार के लिए यह स्वीकार करना बेहद मुश्किल है कि अब वह कभी अपने सपनों को पूरा नहीं कर पाएगा।
अक्षत की बहन लीची भी भाई की मौत से सदमे में है। परिवार के मुताबिक, वह इस सदमे से इतनी टूट गई हैं कि बोल तक नहीं पा रही हैं।
पिता ने प्रशासन से पूछा- ऐसी इमारतों की जांच क्यों नहीं हुई?
अक्षत के पिता ने हादसे के बाद प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ऐसी इमारतों का नियमित निरीक्षण होना चाहिए, ताकि वहां रहने वाले छात्रों और अन्य लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
उनका कहना था कि परिवार अपने बच्चों को इन इमारतों में इस भरोसे के साथ भेजते हैं कि वे सुरक्षित रहेंगे। उन्हें कभी उम्मीद नहीं थी कि जिस जगह उनका बेटा पढ़ाई और भविष्य बनाने के लिए रह रहा है, वही जगह उसकी जान ले लेगी।
सत्य निकेतन हादसे ने खड़े किए सुरक्षा पर सवाल
दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन इलाके में रविवार दोपहर करीब 1:30 बजे पांच मंजिला PG इमारत ढह गई थी। बताया गया कि इमारत करीब 40 साल पुरानी थी। हादसे के बाद बड़े स्तर पर राहत और बचाव अभियान चलाया गया।
घटना में अब तक 7 लोगों की मौत की जानकारी सामने आई है। मृतकों में छात्रों के शामिल होने से उन परिवारों की चिंता और बढ़ गई है, जो अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए दिल्ली जैसे शहरों में भेजते हैं।
अर्पित और अक्षत की कहानी सिर्फ दो परिवारों के दुख की कहानी नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि छात्रों और किरायेदारों के रहने वाली पुरानी इमारतों की सुरक्षा जांच कितनी नियमित और प्रभावी है।
हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल- जिम्मेदारी किसकी?
बिल्डिंग गिरने की घटना के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इमारत की स्थिति पहले से कैसी थी और क्या उसकी सुरक्षा को लेकर कभी जांच या चेतावनी दी गई थी। हादसे की वास्तविक वजह और जिम्मेदारी से जुड़े तथ्य जांच के बाद ही स्पष्ट होंगे।
फिलहाल कई परिवार अपनों को खोने के गम में हैं। अर्पित के परिवार ने उनकी आंखें दान कर एक सकारात्मक संदेश दिया है, जबकि अक्षत के परिवार के सामने बेटे के अधूरे सपनों की यादें रह गई हैं।
सत्य निकेतन का यह हादसा एक बार फिर याद दिलाता है कि शहरों में छात्रों और युवाओं के लिए इस्तेमाल होने वाली पुरानी इमारतों की सुरक्षा को लेकर लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
