नई दिल्ली: भारत की न्यायिक व्यवस्था में लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों की चर्चा अक्सर होती रहती है, लेकिन इस बार सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे भूमि विवाद का अंत किया है, जिसकी शुरुआत देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में हुई थी। करीब 70 वर्षों तक चली इस कानूनी लड़ाई का फैसला अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में आया है। इस ऐतिहासिक मामले में एक ही परिवार की चार पीढ़ियां अदालतों के चक्कर काटती रहीं, जिसके बाद आखिरकार सर्वोच्च अदालत ने अंतिम फैसला सुनाकर विवाद पर विराम लगा दिया।
हरिद्वार की 15.5 बीघा जमीन को लेकर था पूरा विवाद
पूरा मामला उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के नरसिपुर कलां गांव स्थित 15.5 बीघा कृषि भूमि से जुड़ा है। यह विवाद वर्ष 1957 में पंजीकृत एक बिक्री विलेख (सेल डीड) से शुरू हुआ था। अपीलकर्ताओं के पूर्वजों ने उस समय यह जमीन खरीदी थी और उनका दावा था कि खरीद के बाद से लगातार उनका ही जमीन पर कब्जा रहा।
बाद में वर्ष 1984 में विक्रेताओं में से एक ने अपनी आपत्ति वापस ले ली, जिसके बाद जमीन का म्यूटेशन खरीदारों के पक्ष में दर्ज कर दिया गया। हालांकि, आगे चलकर चकबंदी की प्रक्रिया के दौरान इस भूमि पर फिर से विवाद खड़ा हो गया।
चकबंदी प्रक्रिया में फिर शुरू हुई कानूनी जंग
साल 1991 में अपीलकर्ताओं ने खुद को भूमिधर घोषित करने की मांग की। शुरुआत में चकबंदी अधिकारी ने उनके दावे को स्वीकार कर लिया और वर्ष 1993 में हुए समझौते ने भी उनके कब्जे की पुष्टि की।
लेकिन कुछ अन्य सह-भूस्वामियों की आपत्तियों के बाद मामला दोबारा खोला गया। विस्तृत सुनवाई के बाद वर्ष 1999 में चकबंदी अधिकारी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि बिक्री विलेख पर्याप्त रूप से सिद्ध नहीं हुआ और यह तत्कालीन कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करता है। बाद में अपीलीय और पुनरीक्षण प्राधिकरणों ने भी यही फैसला बरकरार रखा।
2017 में हाई कोर्ट से भी नहीं मिली राहत
अपीलकर्ताओं ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वर्ष 2017 में वहां भी उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां वर्षों की कानूनी प्रक्रिया के बाद आखिरकार अंतिम फैसला सुनाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलट दिया पुराना फैसला?
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि 4 जून 1957 की पंजीकृत सेल डीड को अमान्य घोषित करने का कोई मजबूत कानूनी आधार मौजूद नहीं था।
सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि न तो किसी पक्ष ने यह आरोप लगाया कि बिक्री विलेख फर्जी था, न ही यह कहा गया कि दस्तावेज धोखाधड़ी, दबाव या प्रतिरूपण के जरिए तैयार कराया गया था। अदालत के अनुसार, पूरे विवाद में केवल कुछ मामूली तकनीकी विसंगतियों को आधार बनाया गया, जिनके आधार पर किसी वैध पंजीकृत दस्तावेज को निरस्त नहीं किया जा सकता।
‘पंजीकृत बिक्री विलेख को यूं नजरअंदाज नहीं किया जा सकता’
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब किसी पंजीकृत बिक्री विलेख की वैधता पर गंभीर कानूनी चुनौती नहीं दी गई हो, तो केवल छोटे-मोटे तकनीकी अंतर के आधार पर उसे शून्य नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी माना कि अपीलकर्ता लगातार जमीन पर अपने कब्जे का दावा करते रहे और प्रतिवादी इस दावे का प्रभावी ढंग से खंडन नहीं कर सके। इसी आधार पर सर्वोच्च अदालत ने 70 साल पुराने विवाद का अंत करते हुए जमीन पर अपीलकर्ताओं के अधिकार को मान्यता दे दी।
इस फैसले की चर्चा पूरे देश में क्यों हो रही है?
यह फैसला केवल इसलिए खास नहीं है कि विवाद सात दशक तक चला, बल्कि इसलिए भी कि इस मुकदमे की शुरुआत उस दौर में हुई थी जब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सत्ता में थे। तब से लेकर अब तक कई सरकारें बदलीं, लेकिन मामला अदालतों में चलता रहा। आखिरकार चार पीढ़ियों तक चली कानूनी लड़ाई का अंत सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ हुआ, जिसे देश के सबसे लंबे समय तक चले भूमि विवादों में से एक माना जा रहा है।
