Ranchi के सरकारी अस्पतालों में इन दिनों खून की भारी कमी देखने को मिल रही है। खासकर Rajendra Institute of Medical Sciences (रिम्स) के ब्लड बैंक गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। लगातार घटते स्टॉक की वजह से कई ब्लड ग्रुप लगभग खत्म होने की स्थिति में पहुंच गए हैं, जिसका सीधा असर गंभीर मरीजों के इलाज पर पड़ रहा है।
दुर्घटना, प्रसूति, कैंसर, थैलेसीमिया, सिकल सेल और हीमोफिलिया जैसी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को समय पर रक्त नहीं मिल पा रहा है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि मरीजों के परिजन अस्पतालों के बाहर, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और व्हाट्सएप ग्रुप्स में रक्तदाताओं की तलाश कर रहे हैं। कई मामलों में अस्पताल की ओर से रिप्लेसमेंट डोनर लाने के बाद ही ब्लड उपलब्ध कराया जा रहा है।
अस्पताल सूत्रों के मुताबिक ओ-नेगेटिव, ए-नेगेटिव और बी-नेगेटिव जैसे दुर्लभ ब्लड ग्रुप की सबसे ज्यादा कमी है। कई बार आपातकालीन स्थिति में मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। वर्तमान स्थिति में “सेम टू सेम” प्रक्रिया अपनाई जा रही है, यानी जिस ग्रुप का रक्त डोनेट किया जा रहा है, उसी को प्रोसेस करके करीब 8 घंटे बाद मरीज को दिया जा रहा है।
इस संकट का सबसे ज्यादा असर उन मरीजों पर पड़ रहा है जिन्हें नियमित रूप से रक्त चढ़ाने की जरूरत होती है। थैलेसीमिया और सिकल सेल के हजारों मरीज हर महीने ट्रांसफ्यूजन पर निर्भर हैं। केवल Ranchi में बड़ी संख्या में ऐसे मरीजों का इलाज रिम्स और सदर अस्पताल में होता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मी के मौसम में रक्तदान कम हो जाता है, वहीं रक्तदान शिविरों की संख्या में भी कमी आई है। नियमित डोनर नेटवर्क कमजोर होने और लोगों के केवल जरूरत पड़ने पर रक्तदान के लिए आगे आने से यह समस्या और बढ़ गई है।
जानकारी के अनुसार Jharkhand में हर साल करीब 10 लाख यूनिट रक्त की जरूरत होती है, लेकिन इसके मुकाबले संग्रह काफी कम हो पाता है। डॉक्टरों और सामाजिक संगठनों ने लोगों से स्वैच्छिक रक्तदान के लिए आगे आने की अपील की है। उनका कहना है कि एक यूनिट रक्त कई लोगों की जिंदगी बचा सकता है।
