नई दिल्ली: CJP Protest से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टता देते हुए अपने 28 जुलाई के आदेश में संशोधन किया है। अदालत ने कहा है कि राज्यों को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR वापस लेने या उन्हें बंद करने की स्वतंत्रता होगी, लेकिन यह राहत उन लोगों को नहीं मिलेगी जिन पर हत्या, दुष्कर्म, POCSO या अन्य गंभीर एवं जघन्य अपराधों के आरोप हैं। कोर्ट ने साफ किया कि उसके पहले के आदेश का गलत अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए। मामले की अगली सुनवाई अब 19 अगस्त को होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने पुराने आदेश का अर्थ किया स्पष्ट
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने कहा कि उसके 28 जुलाई के आदेश में इस्तेमाल किए गए “आपराधिक इतिहास” शब्द का मतलब केवल ऐसे लोगों से है जिन पर गंभीर और जघन्य अपराधों के आरोप हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि छोटे-मोटे मामलों, सामान्य आरोपों या राजनीतिक कारणों से प्रदर्शन में शामिल लोगों को इस श्रेणी में नहीं माना जाएगा। ऐसे मामलों में राज्य सरकारें चाहें तो दर्ज FIR वापस लेने या बंद करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती हैं।
राज्यों को मिली कार्रवाई की स्वतंत्रता
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि दिल्ली सहित सभी राज्य प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों की समीक्षा कर सकते हैं और कानून के अनुसार उचित मामलों में FIR वापस लेने का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। हालांकि, गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में किसी प्रकार की राहत देने का सवाल नहीं उठता।
केंद्र सरकार ने दोहराया अपना रुख
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार अपने पहले दिए गए आश्वासन पर कायम है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों पर पहले से हत्या, दुष्कर्म, POCSO जैसे गंभीर अपराधों के मामले दर्ज हैं, उनके खिलाफ दर्ज FIR वापस नहीं ली जाएगी। केंद्र ने अदालत को यह भी बताया कि ऐसे 2,700 से अधिक लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने का कोई प्रस्ताव नहीं है।
प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने पुलिस कार्रवाई पर कई गंभीर सवाल उठाए। अदालत को बताया गया कि कुछ पुलिसकर्मी बिना वर्दी के कार्रवाई में शामिल थे और कई मामलों में अत्यधिक बल प्रयोग किया गया। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि लाठीचार्ज, पेलेट गन के इस्तेमाल और अन्य कार्रवाई के पीछे जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
वकीलों ने यह भी मांग की कि पुलिस आयुक्त और RAF के वरिष्ठ अधिकारियों से हलफनामा लेकर पूछा जाए कि आखिर किसके निर्देश पर ऐसी कार्रवाई की गई और पेलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति किस आधार पर दी गई।
फेशियल सर्विलांस और निजता के अधिकार का मुद्दा भी उठा
सुनवाई के दौरान प्रदर्शन स्थल पर बड़े पैमाने पर फेशियल सर्विलांस किए जाने का मुद्दा भी अदालत के सामने रखा गया। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि प्रदर्शनकारियों की सहमति के बिना निगरानी की गई, जो निजता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है। साथ ही आधार डेटा के संभावित उपयोग और उसके संरक्षण को लेकर भी सवाल उठाए गए। अदालत ने इन सभी पहलुओं पर केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है।
पेलेट गन के इस्तेमाल पर मांगा जवाब
वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने अदालत में कहा कि जम्मू-कश्मीर के बाद दिल्ली में भी पेलेट गन का इस्तेमाल किए जाने के आरोप सामने आए हैं। उन्होंने पूछा कि क्या इसके लिए कोई वैधानिक आदेश जारी किया गया था। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र सरकार से निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक इस मुद्दे पर स्पष्ट जवाब दाखिल किया जाए।
राज्यों के मुख्य सचिवों को भी कोर्ट का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों को भी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत यह जानना चाहती है कि अब तक कितने मामलों में FIR वापस लेने या बंद करने की प्रक्रिया शुरू की गई है और राज्यों ने इस दिशा में क्या कदम उठाए हैं।
19 अगस्त को होगी अगली सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी। उस दिन सुप्रीम कोर्ट संभावित SIT गठन, पेलेट गन के इस्तेमाल, पुलिस कार्रवाई, फेशियल सर्विलांस और FIR वापस लेने की प्रक्रिया की प्रगति सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से विचार करेगा। अदालत के इस संशोधित आदेश के बाद अब राज्यों को प्रदर्शनकारियों से जुड़े मामलों की अलग-अलग श्रेणियों में समीक्षा करने का स्पष्ट कानूनी आधार मिल गया है।
