झारखंड : झारखंड की राजधानी रांची में JPSC और JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की CBI जांच की मांग को लेकर चल रहा छात्र आंदोलन अब नए मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है। जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में शुरू हुआ यह आंदोलन शुरुआत में एकजुटता का प्रतीक माना जा रहा था, लेकिन अब आंदोलन स्थल पर अलग-अलग छात्र समूहों की मौजूदगी और दो अलग टेंट लगाए जाने के बाद आंदोलन की दिशा और नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि सभी छात्र अब भी निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग पर कायम हैं।
आंदोलन स्थल पर क्यों बने दो अलग-अलग समूह?
शुरुआत में सभी छात्र एक ही मंच और एक ही टेंट के नीचे अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन अब आंदोलन स्थल पर दो अलग-अलग टेंट दिखाई देने के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि छात्र आंदोलन के भीतर मतभेद बढ़ रहे हैं। आंदोलन में शामिल विभिन्न छात्र समूह नेतृत्व, रणनीति और आगे की कार्ययोजना को लेकर अलग-अलग राय रखते दिखाई दे रहे हैं।
CBI जांच की मांग अब भी आंदोलन का मुख्य मुद्दा
आंदोलन में शामिल छात्रों का कहना है कि उनकी प्राथमिक मांगों में कोई बदलाव नहीं आया है। वे अब भी JPSC और JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच, CBI से जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। हालांकि आंदोलन के संचालन और नेतृत्व को लेकर अलग-अलग विचार सामने आने से आंदोलन की एकजुटता पर सवाल उठने लगे हैं।
राजनीतिक समर्थन को लेकर बढ़ी बहस
आंदोलन के दौरान कुछ छात्र समूहों ने विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के समर्थन मिलने का दावा किया है। वहीं दूसरी ओर कुछ छात्र इस बात पर जोर दे रहे हैं कि आंदोलन को पूरी तरह गैर-राजनीतिक रखा जाना चाहिए, ताकि इसकी विश्वसनीयता और उद्देश्य प्रभावित न हों। इसी मुद्दे को लेकर छात्रों के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं।
रणनीति को लेकर अलग-अलग राय
आंदोलन में शामिल एक वर्ग का मानना है कि किसी भी राजनीतिक प्रभाव से दूरी बनाए रखना जरूरी है, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि बड़े जनआंदोलनों में सामाजिक और राजनीतिक समर्थन मिलना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इन अलग-अलग विचारों के कारण आंदोलन की आगामी रणनीति को लेकर भी स्पष्ट सहमति बनती नजर नहीं आ रही है।
क्या आंदोलन की ताकत होगी प्रभावित?
रविवार को आंदोलन स्थल पर छात्रों की संख्या बढ़ने की उम्मीद थी, लेकिन अलग-अलग समूहों में बैठने की स्थिति ने पूरे घटनाक्रम को नई चर्चा का विषय बना दिया। दिनभर छात्र संगठनों के बीच बैठकें और आगे की रणनीति को लेकर विचार-विमर्श की संभावना जताई गई। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सभी छात्र संगठन साझा मंच पर लौटते हैं या अलग-अलग रणनीतियों के साथ आंदोलन को आगे बढ़ाते हैं।
आने वाले दिनों पर टिकी सबकी नजर
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि आंदोलन पूरी तरह विभाजित हो चुका है, लेकिन अलग-अलग टेंट और अलग नेतृत्व की तस्वीरों ने कई सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। यदि छात्र अपने साझा मुद्दों पर दोबारा एकजुट होते हैं तो आंदोलन को नई मजबूती मिल सकती है। वहीं यदि मतभेद और बढ़ते हैं तो इसका असर आंदोलन की दिशा, प्रभाव और सरकार पर बनने वाले दबाव पर भी पड़ सकता है। अब सभी की निगाहें छात्र नेताओं के अगले कदम और आंदोलन की आगामी रणनीति पर टिकी हुई हैं।
