INDIA गठबंधन की ‘मॉक संसद’ में चुनाव आयोग पर विपक्ष का तीखा हमला, SIR प्रक्रिया को लेकर उठाए सवाल; खरगे ने मुख्य चुनाव आयुक्त से निष्पक्ष तरीके से काम करने की मांग की
नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी INDIA गठबंधन ने अपना विरोध और तेज कर दिया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए विपक्ष ने संसद के बाहर एक अलग राजनीतिक मंच तैयार किया। इसी कड़ी में कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर ‘मॉक संसद’ का आयोजन किया गया, जहां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सांकेतिक ‘जन-महाभियोग प्रस्ताव’ पेश किया गया।
नई दिल्ली स्थित 10 राजाजी मार्ग पर आयोजित इस कार्यक्रम में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समेत INDIA गठबंधन के कई नेता शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार ने की। विपक्ष ने इस आयोजन के जरिए चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को सार्वजनिक रूप से उठाने की कोशिश की।
खरगे बोले- खतरे में है वोट डालने का अधिकार
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मल्लिकार्जुन खरगे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि आज देश में लोगों का वोट डालने का अधिकार खतरे में है और मुख्य चुनाव आयुक्त प्रधानमंत्री तथा गृह मंत्री के निर्देशों के अनुसार चुनाव आयोग का संचालन कर रहे हैं।
खरगे ने कहा, “आज हमारा वोट डालने का अधिकार खतरे में है, क्योंकि CEC ज्ञानेश कुमार प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के आदेशों के अनुसार चुनाव आयोग को चला रहे हैं। हमारा CEC से कोई निजी बैर नहीं है। हम चाहते हैं कि चुनाव आयोग निष्पक्ष होकर काम करे। विपक्ष का वोट काटा जा रहा है और राज किया जा रहा है।”
खरगे के इस बयान के जरिए विपक्ष ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उसकी लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ी है। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची से जुड़े मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं की जा रही है और इसका असर विपक्षी मतदाताओं के अधिकारों पर पड़ सकता है।
संसद में रास्ता नहीं खुला तो विपक्ष ने अपनाया ‘मॉक संसद’ का तरीका
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के इस सांकेतिक जन-महाभियोग कार्यक्रम की पृष्ठभूमि में संसद के भीतर हुई राजनीतिक गतिविधियां भी अहम हैं। विपक्षी दलों ने इससे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संसद में महाभियोग का नोटिस देने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी यह पहल आगे नहीं बढ़ सकी।
विपक्षी दलों का कहना है कि लोकसभा और राज्यसभा के पीठासीन अधिकारियों ने उनके नोटिस स्वीकार नहीं किए। इसके बाद विपक्ष ने संसद के भीतर अपनी बात रखने का रास्ता बंद होने का आरोप लगाते हुए जनता के बीच इस मुद्दे को उठाने का फैसला किया।
कांग्रेस सांसद शशि थरूर भी इस मुद्दे पर कह चुके हैं कि जब संसद के अंदर प्रस्ताव पर चर्चा का रास्ता नहीं खुला, तो विपक्ष को जनता के सामने अपनी बात रखने के लिए दूसरा तरीका अपनाना पड़ा। इसी रणनीति के तहत खरगे के आवास पर ‘मॉक संसद’ का आयोजन किया गया।
विपक्ष इस कार्यक्रम को चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाने और मुख्य चुनाव आयुक्त की जवाबदेही तय करने की राजनीतिक पहल के रूप में पेश कर रहा है।
क्या है ‘जन-महाभियोग’ प्रस्ताव की अहमियत?
खरगे के आवास पर पेश किया गया जन-महाभियोग प्रस्ताव एक सांकेतिक राजनीतिक विरोध है। इसे संसद में होने वाली औपचारिक कार्यवाही या मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। इस आयोजन के माध्यम से विपक्ष ने अपने आरोपों को सार्वजनिक मंच पर रखा और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने की कोशिश की।
विपक्ष का मकसद इस मुद्दे को केवल संसद तक सीमित रखने के बजाय आम मतदाताओं के बीच ले जाना है। INDIA गठबंधन के नेताओं का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया में निष्पक्षता और मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है।
SIR प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर विपक्ष के गंभीर आरोप
इस पूरे विवाद के केंद्र में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) है। विपक्षी दल लंबे समय से इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से सूची से बाहर न हो।
विपक्ष का कहना है कि SIR के दौरान कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी नागरिक का मतदान करने का अधिकार प्रभावित न हो। इसी मुद्दे को लेकर विपक्ष लगातार चुनाव आयोग से जवाब मांग रहा है।
विपक्षी नेताओं की चिंता है कि मतदाता सूची में किसी भी तरह की गड़बड़ी का असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है। हालांकि, SIR को लेकर लगाए गए आरोपों और कथित अनियमितताओं पर चुनाव आयोग का पक्ष तथा संबंधित तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि भी महत्वपूर्ण है।
चुनाव आयोग के भीतर फैसलों को लेकर भी उठे सवाल
SIR विवाद के बीच चुनाव आयोग के अंदर निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हुई है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 बार कुछ फैसलों पर आपत्ति जताई थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन चुनाव आयुक्तों की शिकायत थी कि कुछ महत्वपूर्ण निर्णय उनकी जानकारी के बिना लिए गए। बताया गया कि इन फैसलों में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े निर्णय भी शामिल थे।
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया, अधिकारियों के बीच समन्वय और संस्थागत पारदर्शिता को लेकर राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई। विपक्ष ने भी इन मुद्दों को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने के लिए अपने तर्कों में शामिल किया है।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सियासी टकराव तेज
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ INDIA गठबंधन का यह सांकेतिक जन-महाभियोग कार्यक्रम चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच बढ़ते टकराव का एक नया उदाहरण है। विपक्ष जहां SIR की प्रक्रिया और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर जवाबदेही की मांग कर रहा है, वहीं इस पूरे विवाद में चुनाव आयोग की निष्पक्षता और निर्णय प्रक्रिया प्रमुख राजनीतिक मुद्दे बन गए हैं।
खरगे के आवास पर आयोजित ‘मॉक संसद’ के जरिए विपक्ष ने साफ संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को संसद के बाहर भी उठाता रहेगा। अब देखना होगा कि चुनाव आयोग इन सवालों और आरोपों पर क्या जवाब देता है और SIR को लेकर जारी राजनीतिक विवाद आने वाले दिनों में क्या रुख अपनाता है।
