खूंटी: झारखंड के खूंटी जिले के तोरपा क्षेत्र में बीते 25 दिनों से हाथियों के एक झुंड ने सड़क किनारे डेरा जमा रखा है। इस वजह से इलाके में आवाजाही प्रभावित हो गई है और राहगीरों के बीच लगातार डर का माहौल बना हुआ है। सुबह हो या देर शाम, इस मार्ग से गुजरने वाले लोग पहले आसपास की स्थिति का जायजा लेते हैं, फिर बेहद सावधानी के साथ आगे बढ़ते हैं। वाहन चालक भी धीमी गति से सफर कर रहे हैं, जबकि आसपास के गांवों के लोग हर दिन किसी अनहोनी की आशंका के बीच जीवन गुजार रहे हैं।
सिर्फ हाथियों की मौजूदगी नहीं, बदलते जंगलों की भी कहानी
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल सड़क पर हाथियों के डेरा डालने की घटना नहीं है, बल्कि जंगलों के बदलते स्वरूप और मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती चुनौती का संकेत भी है। जिस तरह तेजी से जंगलों का क्षेत्र घटा है और विकास परियोजनाओं का विस्तार हुआ है, उससे हाथियों के पारंपरिक आवागमन के रास्ते लगातार प्रभावित हुए हैं। इसका असर अब सीधे गांवों और सड़कों पर दिखाई देने लगा है।
एलीफेंट कॉरिडोर टूटने से बढ़ रहा है मानव-हाथी संघर्ष
वन्यजीव विशेषज्ञ एवं सेवानिवृत्त वन प्रमंडल पदाधिकारी अर्जुन बड़ाइक बताते हैं कि हाथी बिना कारण आबादी वाले इलाकों की ओर नहीं आते। सदियों पुराने एलीफेंट कॉरिडोर, जिनका उपयोग हाथियों के झुंड पीढ़ियों से करते आ रहे थे, अब सड़क निर्माण, खनन, रेलवे लाइन, औद्योगिक परियोजनाओं और बढ़ती आबादी के कारण बाधित हो चुके हैं। जिन रास्तों से कभी हाथियों का सुरक्षित आवागमन होता था, वहां आज खेत, मकान और बाजार विकसित हो चुके हैं। ऐसे में हाथियों को मजबूर होकर नए रास्तों की तलाश करनी पड़ रही है।
भोजन और पानी की तलाश में गांवों की ओर बढ़ रहे हाथी
विशेषज्ञों के अनुसार एक वयस्क हाथी को प्रतिदिन लगभग 150 से 200 किलोग्राम भोजन और पर्याप्त मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। जब जंगलों में भोजन और जल स्रोत कम पड़ने लगते हैं, तब हाथियों का झुंड मक्का, धान और गन्ने जैसी फसलों वाले खेतों की ओर आकर्षित होता है। इससे किसानों की महीनों की मेहनत कुछ ही घंटों में नष्ट हो जाती है और यहीं से मानव-हाथी संघर्ष की स्थिति पैदा होने लगती है।
हाथियों को भगाने की कोशिश कई बार बन जाती है जानलेवा
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे गंभीर स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब लोग हाथियों को भगाने के लिए मशाल, पटाखे, ढोल-नगाड़े, ईंट-पत्थर या बिजली के अवैध तारों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में हाथी स्वयं को खतरे में महसूस करते हैं और जवाबी हमला कर सकते हैं। कई मामलों में इस तरह की घटनाओं में इंसानों के साथ-साथ हाथियों की भी जान चली जाती है।
प्राकृतिक गलियारों का संरक्षण ही स्थायी समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हाथियों के प्राकृतिक आवास, जल स्रोत और पारंपरिक एलीफेंट कॉरिडोर को सुरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाले समय में मानव-हाथी संघर्ष और अधिक गंभीर रूप ले सकता है। उनका कहना है कि केवल हाथियों को आबादी वाले क्षेत्रों से हटाना समाधान नहीं है, बल्कि जंगलों और उनके प्राकृतिक मार्गों का संरक्षण ही इस समस्या का दीर्घकालिक और प्रभावी उपाय हो सकता है।
